उत्तराखंड कैबिनेट का बुधवार का फैसला: पिटकुल और यूपीसीएल में एमडी पद के लिए अब तकनीकी ज्ञान अनिवार्य नहीं

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देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने ऊर्जा निगमों के शीर्ष पदों को लेकर बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। राज्य कैबिनेट ने बुधवार को ऊर्जा निगमों में प्रबंध निदेशक (एमडी) पद की अनिवार्य तकनीकी अर्हता को संशोधित करने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। इस फैसले के बाद अब गैर-तकनीकी पृष्ठभूमि वाले अधिकारी भी एमडी नियुक्त किए जा सकेंगे। यह संशोधन राज्य के तीन प्रमुख ऊर्जा निगमों पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन ऑफ उत्तराखंड लिमिटेड (पिटकुल), उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) और उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएनएल) पर लागू होगा। अब तक इन निगमों में एमडी पद के लिए तकनीकी योग्यता, जैसे बीटेक या समकक्ष इंजीनियरिंग डिग्री, अनिवार्य थी।

कैबिनेट में लाए गए प्रस्ताव में कहा गया कि ऊर्जा क्षेत्र के प्रबंधन और प्रशासनिक संचालन के लिए केवल तकनीकी योग्यता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रबंधन कौशल, वित्तीय समझ और प्रशासनिक अनुभव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसी आधार पर अर्हता में संशोधन किया गया है। शासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि संशोधन के बाद अब व्यापक प्रशासनिक अनुभव रखने वाले अधिकारी भी एमडी पद के लिए पात्र होंगे। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब हाल ही में उच्च न्यायालय ने पिटकुल के प्रभारी एमडी पीसी ध्यानी को पद से हटाने का आदेश दिया था। 18 फरवरी को दिए गए आदेश में न्यायालय ने कहा था कि संबंधित अधिनियम के अनुसार एमडी पद के लिए तकनीकी पृष्ठभूमि अनिवार्य है, जबकि ध्यानी के पास तकनीकी डिग्री नहीं थी। अदालत ने उन्हें तत्काल प्रभाव से हटाने के निर्देश दिए थे। हालांकि न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया था कि यदि राज्य सरकार उचित कारणों के साथ चाहे तो अधिनियम में संशोधन कर सकती है। सरकार ने उसी दिशा में कदम उठाते हुए अब संबंधित प्रावधानों में बदलाव का रास्ता साफ कर दिया है। सरकार के इस फैसले को प्रशासनिक लचीलापन बढ़ाने के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा निगमों का संचालन केवल तकनीकी मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वित्त, मानव संसाधन, परियोजना प्रबंधन और नीति निर्धारण जैसे महत्वपूर्ण पहलू भी शामिल हैं। ऐसे में व्यापक अनुभव रखने वाले अधिकारियों को अवसर मिलने से संस्थागत दक्षता में सुधार हो सकता है। हालांकि विपक्षी दलों और कुछ विशेषज्ञों द्वारा इस फैसले पर सवाल भी उठाए जा सकते हैं। उनका तर्क है कि ऊर्जा क्षेत्र अत्यधिक तकनीकी प्रकृति का है, ऐसे में शीर्ष पद पर तकनीकी समझ का होना जरूरी है। फिलहाल, कैबिनेट की मंजूरी के बाद संशोधित प्रावधान लागू होने का रास्ता साफ हो गया है। आने वाले समय में ऊर्जा निगमों के नेतृत्व में नए चेहरे देखने को मिल सकते हैं, जिससे राज्य की ऊर्जा नीति और प्रबंधन पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है।